Tuesday, 28 June 2016

एक काफिर ऐसा भी था....!!!

" अरे भाई कहाँ जा रहे हो हनुमान जी के गेटअप मे और नाम क्या है तुम्हारा " तौफीक मियाँ ने एक छोटे बच्चे से पूँछा जिसने हनुमान जी की ड्रेस पहनी हुई थी,
" चचा जान हमारे स्कूल मे फैंसी ड्रेस का कॉम्पटीशन है उसी मे हिस्सा लेने जा रहा हूँ और मेरा नाम सलमान है " उस 7-8 साल के बच्चे ने तौफीक मियाँ से बोला,
" अच्छा, फिर तो जीत के ही आना " तौफीक मियाँ ने हँसते हुए उस बच्चे से कहा और फिर अपने घर की तरफ चल दिये,
.
तौफीक मियाँ पाँचो टाइम के नमाज़ी और ख़ुदा के बताये हुए रास्ते पर चलने वाले बन्दे हैं, ख़ुदा के रास्ते पर चलने के कारण तौफीक मियाँ ने शादी भी नहीं की थी,
अभी तौफीक मियाँ थोड़ी दूर ही चले थे की तभी पीछे से किसी ने आवाज़ लगाई " अरे ओ तौफीक मियाँ ज़रा रुको ", उन्होंने पीछे मुड़ के देखा तो एक आदमी उन्हें बुला रहा था जो उन्हें रोज़ मस्ज़िद मे मिलता था, " हाँ भाईजान कहिये कैसे याद करा " उन्होंने उससे पूँछा,

" मियाँ आपको इमाम साब बुला रहे हैं, आप जल्दी से अब्दुल मियाँ के घर पहुँचिये " उस आदमी ने कहा,

" ठीक है भाईजान आता हूँ " और ये कहकर तौफीक मियाँ अब्दुल के घर की ओर चल दिये,

वहाँ पहुँच के उन्होंने देखा की वहाँ पर पहले से ही 70-80 आदमी मौजूद थे, और उनके सामने इमाम साब खड़े होकर कुछ कह रहे थे, तौफीक मियाँ ने पास जा के सुना तो इमाम साब उन सब लोगों से कह रहे थे की " भाई लोगों इस्लाम खतरे मे है, लड़ाई कभी भी छिड़ सकती है, सुना है उन हिन्दू काफिरों ने हमारे 5 लोगों का क़त्ल कर दिया है, हम भी चुप बैठने वाले नहीं, हम 5 के बदले 50 को मारेंगे, तुम सब लोग हथियार ले के अभी उन काफिरों पर हमला बोल दो " इमाम की बात सुनकर सब लोग अल्लाह ओ अकबर करके हाँथ हवा मे लहराते हुए बाहर निकल गये, और इधर तौफीक मियाँ हक्के बक्के से खड़े ही रह गये, उन्हें खड़ा देखकर इमाम ने उनसे बोला " क्या हुआ, तुम यहाँ क्यूँ खड़े हो, बाहर जाकर उन काफिरों को सबक क्यों नहीं सिखाते "

" लेकिन इमाम साब रोज़ाना मस्ज़िद मे तो आप कुछ और ही सबक सिखाते थे, दीन का सबक, ईमान का सबक, इंसानियत का सबक, आज ये कौन सा सबक सिखा रहे हैं आप "

इमाम साब गुस्से से बोले " मियाँ वो सब बकवास था, अब जो मैं तुमसे कह रहा हूँ वो ही सही है, इसलिए बहस छोड़ के जो मैंने कहा है वो करो " और ये बोलकर इमाम साब पीछे के दरवाजे से बाहर निकल गये,

और तभी तौफीक मियाँ को बाहर चीखने चिल्लाने का शोर सुनाई दिया, तौफीक मियाँ ने बाहर आकर देखा तो सब तरफ बुरा हाल था, वो लोग औरतों, बच्चों को सभी को मार रहे थे, चारों तरफ सिर्फ लाशें बिखरी पड़ीं थीं, वो मंज़र देखकर तौफीक मियाँ का कलेजा मुँह को आ गया, उनके पसीने छूट गये, पैर काँपने लगे, वो लड़खड़ाते पैरों से आगे बढे तो थोड़ी दूर पर वो ही बच्चा मरा पड़ा था जो उन्हें हनुमान जी के गेटअप मे मिला था, उन वहशियों ने हिन्दू के धोखे मे उस मासूम को भी अपनी वहशियत का शिकार बना दिया था, तौफीक मियाँ दहाड़ मार के वहीँ घुटनो के बल गिर पड़े, काफी देर वहीँ पड़े रोते रहे, फिर अचानक उठे, आँसू पोंछे और उस बच्चे की लाश कन्धे पर उठा के सीधे मस्ज़िद ले के पहुँच गये और उस बच्चे की लाश को इमाम के सामने रख के गरजते हुए बोले " इमाम साब देखो इसे, इसी से तो तुम्हारे इस्लाम को खतरा था ना ?? इस मासूम से ??? इसी से डर गये थे ना तुम और तुम्हारे लोग ?? तभी तो उन वहशियों ने इस मासूम को मार के तुम्हारे इस्लाम को बचा लिया, इमाम साब फर्क है तुम्हारे इस्लाम मे और मेरे इस्लाम मे, मेरा इस्लाम मेरा ख़ुदा इंसानियत को मारने को नहीं कहता तुम्हारे इस्लाम की तरह, मेरा ख़ुदा पहले इंसानियत की बात करता है और तुम्हारा वहशियत का, आज से मेरे लिये वो जगह हराम है जहाँ आप जैसे वहशी लोग हों, आज से मेरे लिये ये जगह भी हराम है जहाँ आप खड़े हैं और हाँ आज से आप मुझे भी बड़े शौक से काफ़िर कह सकते हैं "
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और इतना बोल के तौफीक मियाँ उस बच्चे की लाश उठा के लड़खड़ाते हुए कब्रिस्तान की तरफ चल दिये...

बात उन दिनों की है जब मैं यूपी के दौरे पर था...!!!
(2012/13)

:- Raj Vasani...😉☺

Saturday, 11 June 2016

मेरी अधूरी मोहब्बतें....

(7)

इधर गर्मियाँ बढ़ती जा रही थी और उधर हमारी सेहत दिन-ब-दिन सुधरती जा रही थी। यही कोई बीस-एक दिन बाद वापस दिल्ली का रूख किया गया...दो-चार बार पगली से कुछ सेकेंडो वाली बात भी हुवी थी इसबीच में। अब चूँकि घर में हम खूब बदनाम हो चुके थे तो तमाम निगरानियाँ झेलना होता था...सो बमुश्किल एकाध सिगरेट ही रोज के हिसाब से फूँक पाते थे। राजकोट पहुँचते ही माइल्ड डिब्बा लेके तरकीब से छुपाया गया...शाम तक में ही हमें शहादत वाली फीलींग आने लग गई। खैर ट्रेन बिठाने भैया साथ आये...बर्थ खोजके बैठा गया...अब हम बेसब्र हो रहे थे ट्रेन के चल पङने को लेकर। पन्द्रह-बीस मिनट मेंटली टाॅर्चर करने के बाद ट्रेन चल पङी आखिरकार...हम अब बखूबी महसूस कर सकते थे कि अगस्त 1947 में हमारे देश की तत्कालीन पीढ़ी कितना खुश हुवी होगी। अब हम आज़ाद थे सो जश्न-ए-आज़ादी तसल्ली से लगातार दो सिगरेट फूँक के मनाया गया। पगली अचानक ही कलेजे से कुछ बोल पङी...अब बिना फोन किए कैसे मान भी सकते थे हम...पर काश कि न किया होता! लगातार चार फोन करने के बाद पगली का मैसेज मिला वो भी धमक लिए अंदाज़ में..."मेरा जीना न हराम़ करो...तुम कहीं मर क्यूँ नहीं जाते?" अब कौन बताता पगली को हम अपने तरफ़ से तो मर ही चुके थे...वो तो दास्तां-ए-मोहब्बत लिखना बाक़ी था सो मौत ने भी दिल तोङ दिया था। पगली के इस मैसेज ने हमें और तोङा...आत्मा तक टूटन के दर्द से कराह उठा था...सफ़र के साथ-साथ हम सफर(Suffer) भी कर रहे थे...खुलके रो पाना भी संभव न था...अंदर का मर्द पब्लिकली रोने की इज़ाजत ही न दे रहा था। रात भर रास्ते में डायरी को काला करता आया...कालिख की थोङी-सी बानग़ी पेश है दोस्तों...
1:- "अपने लाश को भी कंधा देने की हसरत है,
ज़िँदा रहने को...ये भी एक मक़सद है।"
2:- "वो शख्स हँसके क़त्ल करने को मशहूर है,
ज़िँदा रहना है तो पर्दादारी सिखिए।"
आनंद विहार रेलवे स्टेशन...अभी ट्रेन आऊटर सिगनल से प्लेटफार्म के तरफ़ रेंगते हुवे बढ़ रही थी। फोन हौले से कांपा...बात करके मालूम हुवा कि लौंडे पूरी मंडली के साथ हमें रिसीव करने आए हैं। आखिर हम कब्र से वापस लौटकर राजधानी पहुँच रहे थे...दरबारियों को तो खुश होना ही था...उन्हें तो पगली द्वारा हमें मिली झिङकी का पता भी न था। खैर हमारा ज़बर्दस्त स्वागत हुवा...ऐसा स्वागत तो तब भी न हुवा था जब हम युनिवर्सिटी एक्जाम को. फ़ोङ-फ़ाङ के लौटे थे। घर में हो चुकी बदनामी ने हमें मिलने वाले फंड पर कैंची चलवा दिया था बावजूद लौंडों के बीयर की गुँजाईश को टालना हमारे लिए असहनीय था...सो रास्ते भर ऑटो में दौर-ए-किंगफ़िशर चलता रहा। हमारा फ्लैट एक और सदमा तैयार लिए बैठा है...इसका ज़रा भी अंदाज़ा न था किसी को...कमरा खोलते ही एल.सी.डी. के खूँटे को खाली देख हमसब हैरान रह गए।
पहले तो पगली द्वारा गिफ्टेड मोहब्बतिया ग़म...खाली पङा ए.टी.एम...अब ये गायब एल.सी.डी...मने चौतरफ़ा ग़मगीन माहौल हमें घेरे हुवा था। अब कौन परवाह करता है कि पाॅकेट में पाँच सौ का एक ही पत्ता बाक़ी है और फ़िलहाल कहीं से फंड के आसार भी नहीं हैं...वो भी तब जब मंदिर में हमारी इज्जत प्रचंड दानवीरों वाली हो। हमारा टाटा वाला फोन दिखाके अगले सुबह तक का कोटा लेके लौंडा आया और फ़िर हर खुलती बोतल और धुआँ होती हर एक सिगरेट हमारा ग़म कुछ कम करते गयी। आवारगी का एक उसुल है...किसी ग़म से छुटकारा पाना हो तो कोई और ग़म पाल लो। हमें एल.सी.डी. का ग़म मिल चुका था...सो हम पगली के ग़म से तबतक का छुटकारा पा गये जबतक कि हमने एल.सी.डी. जब्त न कर लिया। हमारा फोकस अब सिर्फ़ शराब और एल.सी.डी. था...बेतहाशा ग़मों ने फ़िर से शायर बना दिया था...बाक़ी की कसर मयकश मौसम ने पूरा किया और हम बङे शायरों के साथ गुस्ताख़ हो बैठे...अंदाज़-ए-गुस्ताख़ी आपसबों के सुपुर्द...

गालिब:-
गालिब शराब पीने दे मस्जिद में बैठकर,
या वो ज़गह बता...जहाँ पर खुदा नहीं।

इकबाल:-
मस्जिद खुदा का घर है, पीने की ज़गह नहीं,
काफ़िर के दिल में जा...वहाँ पर खुदा नहीं।

फ़राज़:-
काफ़िर के दिल से आया हूँ ये देखकर फ़राज़,
खुदा मौज़ूद है वहाँ...पर उसे पता नहीं।

वसी:-
खुदा तो मौज़ूद दुनिया में हर ज़गह है,
तु ज़न्नत में जा...वहाँ पीने से मना नहीं।

अब गुस्ताख़ राज:-
ग़र पीने का शौक तुम रखते हो राज,
आ बैठ अभी पी...ज़न्नत बना यहीं।

(जारी...)

- Raj Vasani... 😉😃

Friday, 3 June 2016

मेरी अधूरी मोहब्बतें....

(6)

2013 अपने रौ में...सर्दियाँ गुजरी और फ़िर से पतझड़ बिखरने का मौसम...वही नवम्बर अपनी तमाम मदहोशियाँ और हमारा 20वाँ जन्मदिन लेकर आ गया। पगली के उस लाज़वाब इंकार ने हमें कुछ दिनों के लिए फ़िर से प्यालों के समंदर में गहरे तक गोता लगाने भेज दिया था। एक तो आसो...उपर से शराब...बाक़ी की क़सर पूरी करने हम और हमारा दरबार...हुवा ये कि अबतक का सबसे खर्चीला जन्मदिन मनाया गया। दरअसल हम पगली को ये दिखाने की फ़र्ज़ी क़ोशिशें कर रहे थे कि उसके बिना भी हम बङे मौज़ में हैं...खुद को बरगलाने का काम एक चोट खाए आशिक़ से बेहतर और कोई कर भी नहीं सकता...सो हमने भी बङे शिद्दत से ये काम अंज़ाम दिया। शाम से ही दरबार व्हिस्की-सोडा के बोतलों की खनखनाहट और दाँतों से तोङे जा रहे मनचुरियन की चरमराहट से गुलज़ार हो चला था। लोग आते रहे और गला तर करके जाते रहे...बारह बजते ही थोङा खलल पङा और केक काटे जाने की तैयारियाँ शुरू हुवी पर हमने केक काटने से पहले पगली के एक फोन की उम्मीद बाँध रखा था। समय बढ़ता रहा और महफ़िल का माहौल भी बिगाङता रहा पर पगली का फोन न आया...अपने ग़म को अंदर बाँधे हमने केक काटने की औपचारिकता पूरा किया और जानवरों की तरह व्हिस्की कलेजे में उतारने लगा। तमाम लोग उसदिन गवाह हुवे हमारे बेतरह फट जाने का और सारा का सारा भङास पिछले चुनावों के कुछ विभीषणों पर निकाले जाने का।
कुछ बेहूदे अक्सर हां बोला करते हैं कि पैसे से खुशी भी खरीदा जा सकता है...हमने भी उसदिन खुशी को खरीद लाने की जुर्रत किया था...नतीज़ा दसियों हज़ार रूपये वाया शराब होते पेशाब में तब्दील हो गया पर अंतस ग़मगीन रेगिस्तान ही बना रहा। ठीक एक साल पहले हमने बहुत कम खर्चे में ही ज़िंदगी का बेहतरीन लम्हा जिया था और अब सबकुछ लूटा कर भी रेगिस्तान को रत्ती भर हरियाली न दे सके थे। हमें अहसास हो चुका था कि हमारी ज़िंदगी...हमारी दुनियादारी...बिन पगली सब सून है।
अब ग़मों के गहराते जाने का दौर था...और उस ग़मगीन आग को ज़हर से बुझाने का दौर था। ये वो दौर था जब हमने सुबह आँख खुलते ही प्याले से आचमन करना शुरू कर दिया था...इसी दौर में सुबह से रात तक पाँच बोतल ब्लेंडर्स-प्राइड को गटक जाने का कीर्तिमान भी बनाया गया। जबतक पगली को अपने आशिक़ का होश आया तबतक हम बेहोश होने लगे थे। कुछ शायराना लिखने के लिए दो ही चीज़ जरूरी होती है...एक तो पेन(PEN) और दूसरा पेन(PAIN)...दोनों ही हमारे पास बेहिसाब था। सो तभी लिक्खा गया कि...

"ये कैसी ज़िद है फ़िर से पास आने की राज,
आग हूँ...बोलो उसे...वो जल जाएगी।"

पर पगली को कौन समझा भी सकता था...एक हम ही थे पर हम बोतलों में डूबे हुवे थे। ज़ल्दी ही लीवर ने पैगाम भेज दिया कि हम मोटापे के मरीज़ हो गये हैं...अब हम बिस्तर पर थे और तबियत ने वापस अपने देस जाने का आदेश दे दिया था। हम गये भी...घर में सारा भेद भी खुला...हंगामों की बरसातें भी हुवी...पर जाने से पहले हम मरने के हालात में थे और तब अपने दर्द से डायरी को कुछ इस अंदाज़ में परिचित कराया...

"उल्फ़त का ऐसा अंदाज़...देखो राज,
बात दिल से चली थी...लीवर पे खत्म हो गई।"

(जारी...)

- Raj Vasani 😉😃

Monday, 16 May 2016

मेरी अधूरी मोहब्बतें....

(5)

नेतागिरी में चार सालों के भीषण सक्रियता ने हमें बहुत थका दिया था...और वैसे भी प्रत्यक्ष सक्रियता के उस आखिरी चुनाव में हमने ज़िंदगी के कई पन्नों को अकाल मौत दिया था। अब हम ग्रेजुएट होके आगे की पढ़ाई के लिए पॉलीटेक्निक काॅलेज पहुँच चुके थे...फ़िर से भीङ काफ़ी अज़नबी हो चुकी थी। मालूम नहीं कब हम किंगफिशर से वृद्ध भिच्छुक तक का सफ़र तय किये...पैग में पगली का अक्स खोज़ पाने की तमाम क़ोशिशें नाकाम रही। कभी-कभार फोन या फेसबुक पर हमें छेङकर वो हमारे कलेजे को धधकता छोङ जाती रही...और हम कभी उसको भूलाने तो कभी यादों में ही पगली को जी लेने की ख्वाहिश रखे मदिराफंड को बङा करते रहे। अधूरी मोहब्बतों का सफ़र वाया जेएनयू कब हैदराबाद पहुँचा...कब फ़िर से चोट खा वो पीवीआर वर्ज़न बन गया...हमें ये भी न मालूम...पर ये सबकुछ दिसंबर से पहले जिया जा चुका था।
उस मनहुस साल का वो अंतिम हफ़्ता...साइबेरिया हो जाने की क़ोशिशें करती दिल्ली की वो कंपकपाती बरसाती रात...हम वृद्ध भिच्छुक संग महफ़िल सजाए बैठे थे...इतने दिनों से सुलगता रहा कलेजा उस दिन भिच्छुक के संभाले न संभला और हमने अपनी मोहब्बत का पहला काला पन्ना लिख डाला। पगली को उस रात हमारे द्वारा सुनाई गई लेक्चरनुमा धाराप्रवाह गालियाँ हमारे गुनाहों की सबसे ऊँची इबारतों में से है...ताउम्र हमें ये इबारत अपने लीपे-पूते चेहरे के पीछे का शैतान दिखाता रहेगा। ये आईना हमें आज भी टोकता रहता है और 'गुनाहों का देवता' होने की आत्ममुग्धता में हमें लताङता भी है।
बुराइयों की ये खासियत होती है कि वो हमें अच्छाइयों की कद्र करना सीखा जाती है। हम बेतरह टूटे हुवे थे...आर्थिक स्थिति अपने भीषणतम रूप में...लोगों ने भी स्वाभाविक तौर पर इग्नोरियाना शुरू कर दिया था...फोन जलाकर हम भी खुद को और तन्हा कर चुके थे। पाॅकेट को जब पाला मार जाए तो दुनिया का सबसे बेहतरीन पर्यटनस्थल अपना देस होता है...राजाधीराज द्वारिकाधीश के कर्मभूमि पहुँचकर हम धीरे-धीरे पगली को भूलाने लगे। नये साल के पहले दिन दिल्ली वापसी के बाद युद्ध स्तर पर पढ़ाई किया गया और फेसबुक पर निस्पक्ष लेखन भी शुरू किया गया।
हादसों ने कब किसी को अपनी खबर दिया है! हमारे दरबार का दिन था...दरबारियों ने शराबी दौर में पगली का ज़िक्र कर दिया...हम अपने को रोक न सके...हम लगातार फोन मिलाते रहे और वो हरबार काटती रही...परिणाम हम आत्मघाती हो गये। जानने के बाद पगली हमसे बात तो करने लगी पर अब मोहब्बत की ज़गह डर था उसकी बातों में। पगली को डर था कि अगर हमें कुछ हुवा तो वो बेवज़ह केस-वेस के चक्कर में फंस जाएगी और उसकी पत्रकारिता धरी रह जाएगी। हमें उन तमाम लोगों से नफ़रत होती है जो हमसे सहानुभूति रखे या डरे हमसे। हमने उसदिन बहुत साफ़-साफ़ बात किया तब उसने कहा कि हमसे कभी मोहब्बत किया ही नहीं था उसने...पहले नासमझी थी और अब डर है।
मोहब्बत में ऐसे झटके ही इंसान को शराबी और शायर बना दिया करते हैं...शराबी तो हम पहले से थे ही...अब शायर बन जाने की रूत थी। उन दिनों के कु-वित्व की बानगी अब भी हमारे फेसबुकिया टाइमलाइन की खूबसूरती बढ़ा रहे हैं...उनदिनों का एक कु-विता पेश-ए-नज़र है...

"उधेङबुन में था,
खाली-खाली सा,
तो मैंने उनसे,
ये सवाल कर दिया,
क्यूँ...जा रही हो?
हमसे ही मुँह चुरा रही हो?

वो ज़ोर से हँसी,
थोङा लरज़कर बोली,
मैं आयी ही कब थी?

उनका ये सवाल,
था इतना लाज़वाब,
कि दोस्तों...मुझे भी लाज़वाब कर गयी।"

(जारी...)

- Raj Vasani... 😉😊

Friday, 13 May 2016

मेरी अधूरी मोहब्बतें....

(4)

मार्च का महीना तो वैसे ही बङा रोमांटिक होता है...कामदेव का वसंत...फगुनहट की बयारें...उपर से हमारे जन्मदिन के सिर्फ़ छह दिनों बाद ही पगली का भी जन्मदिन। हमारे बींसवे साल का पहला दिन...पगली के आने की तैयारियाँ...रात की ज़बरदस्त पार्टी के बाद अस्त-व्यस्त पङा दोनों कमरा...जहाँ-तहाँ बिखरे बीयर की बोतलें...केक से सने गंदे कपङे और बेडशीट...मन्चुरियन ड्राय....सिगरेट के बाक़ी बचे फिल्टर्स...खैर बङे मेहनत से एक कमरे की साफ़-सफ़ाई करके रोमांटिक माहौल तैयार किया गया। उत्तेजना अपने चरम पर थी...हमारी ऐसी हालत तो तब भी न हुवी थी जब हम पोलिटिकल सायन्स की परीक्षा देने जा रहे थे। नर्वस पर संतुलन के लिए डेस्कटाॅप पर किशोर दा बजाए गये...एक-एक मिनट के बीस-पच्चीस बरस गुजरने के बाद दरवाजे पर दस्तक हुवी। विलियम वर्ड्सवर्थ लिखे हैं कि हर प्रेमी को अपनी प्रेमिका ट्राॅय की राजकुमारी नज़र आती है...हम भी अपवाद न थे...और हो भी कैसे सकते थे...पगली के उस रूप को अब बंद आँखों से ही महसूस किया करता हूँ। एक कुंवारे के घर में उसकी प्रेमिका की उपस्थिति शराब से भी ज्यादा असर दिखाती है...हमारी साँसें कब जुङी...कब हम एक-दूसरे के कलेजे में उतरे...कुछ ख्याल नहीं...ख्याल है तो बस पगली के फोन में शाम पाँच बजे मनहुस अलार्म का बजना। अब जाना उसकी मज़बूरी थी सो पगली को घर तक पहुँचा आना हमारी भी। काश हमारे पास इतनी ताकत होती कि समय को कुछ देर के लिए थाम सकते...पर वो बेरहम रफ़्तार चलता रहा और हमारे कलेजे पर पहाड़ जैसा बोझ रखता गया। भारी मन से बाहर निकलके हमने ऑटो लिया और पगली को पहुँचा आया।
मुद्दतें गुजरी पर वो दिन लौटकर न आ सका...जबकि वैसी तमाम मनहुस शामें आई और हम उन शामों को हार्ड राॅक कैफ़े में बडवाइज़र मैग्नम, मन्चुरियन ड्राय, क्लासिक माइल्ड, और अपने बेहिसाब तन्हा ग़मों के साथ रातों में तब्दील करते रहे...और किसी अंज़ान शायर के शब्दों के साथ बेकसूर पगली पर क़यामत तक ये तोहमत लगाते रहे, " ये तेरे आँखों की तौहीन है...कि तेरा आशिक़ शराब पीता है"।
अब बारी थी पगली के उन्नीस बरस पूरा करके आगे बढ़ जाने का...ये 2012 आगे चलके इतना अहम और बेरहम हो जानेवाला था...मालूम न था। खैर वक़्त था पगली के हैप्पी जन्मदिन का...पर हम महज़ पाँच-सात दिनों में ही फ़िर से कंगाल हो चुके थे...होते भी क्यों न...चाहनेवालों के गुटबाजी ने पार्टियों की संख्या को बेतरह बढ़ा जो दिया था! हम अबतक चार्वाक के उधार लेकर घी(शराब) पीनेवाली कहावत को चरितार्थ करने लगे थे...सो पगली के जन्मदिन पर उसी से उधार लेकर पार्टी दिया गया। आगे भारी मात्रा में परीक्षाएँ हमारा इंतज़ार कर रही थी...पर हमने कभी इनका बहुत लोड न लिया...परिणाम बढ़िया कहे जाने लायक था भी। सेशन बदलते ही यूनिवर्सिटी में अगले चुनावों का दौर...और ये दौर बहुत खास इसलिए कि इसने पगली को हमसे बिना वज़ह बहुत दूर जाते देखा...इसने हमें कागज़ों पर बर्बाद होते देखा...इसने हमें अपने ही पैर पर कुल्हाङी चलाते कालिदास बनते देखा...इसने हमें नशे में बेतरह डूब जाते देखा...इसने हमें संघी बेहूदगी से बाहर आते देखा...इसने हमें कई चेहरों में अपने पगली को खोजते देखा...इसने नशे में मदहोश कम बेहोश ज्यादा वाली हालत में सङकों-गलियों से हमें उठाते दोस्तों की वो काली रातें भी देखा।
आज भी उन दिनों और रातों की यादें आत्मा को कलपा के रख देती है...अब आज और न लिखा जाएगा...नेतागिरी और मोहब्बतों की उन दर्दीली यादों ने कंठ को भी और उँगलियों को भी जाम करके रख दिया है।
2012 का वो मनहुस अक्टूबर महीना...चुनावी भागदौड़ अपने चरम पर...पगली की ताबङतोङ शिकायतें...खैर तमाम व्यस्तता को परे हटा पगली से माॅडल ध विलेज मिला गया। हमें मालूम न था कि पगली आखिरी मुलाकात करने आई है...उस हसीन मुलाकात के बाद अचानक ही पगली को काॅमर्स छोङके पत्रकारिता का शौक चरचराया और वो हमें अलविदा कहके सुरत चल पङी। तब हम इतने बुरे न थे...पर अभीतक हम वज़ह की तलाश में कोलंबस हुवे जाते हैं। पगली ने हमें नज़रअंदाज़ करना शुरू किया...और जैसा की होता है कि किसीको अगर सबसे बडी़ गाली बिनबोले देनी हो तो उसे नज़रअंदाज़ करते रहो... चुनावी जिम्मेदारियों के कारण हम अपने तक़लीफ़ को अंदर में बाँध के रखे। ये वो समय था जब हमें उसकी सबसे ज्यादा ज़रूरत थी...नेतागिरी ने पुराने दोस्तों को दुश्मन बना दिया था...हम बेहद अकेले थे...सबकुछ जानते हुवे भी पगली हमें मिनट-दर-मिनट मरता छोङ गई वो भी वज़ह बताए बिना।
एक अर्से बाद वो फ़िर से आई ज़िंदगी में पर अब तमाम छलावे और शर्तें लिए हुवे...और इस अर्से में हमने कभी "पिया" तो कभी "राजकुमारी" में अपने पगली को खोज़ा। एक असफ़ल प्रेमी चलता-फ़िरता न्यूक्लियर बम होता है...सो हमारे फटने से पगली के अलावा हर वो कोई झुलसता रहा जो हमारे क़रीब आया।
मुद्दतें गुजरी...हम अपने पगली को न पा सके...वो वापस आई भी तो "पुराने बोतल में नई शराब' के तर्ज़ पर...अफ़सोस कि हमने हमेशा ही पुरानी शराब को पसंद किया है...परिणाम ये कि हम मौत तक के लिए नशे के आगोश में जा पहुँचे...और अब उसकी दिखावटी क़ोशिशें नाकाफ़ी होनी ही थी।

(जारी...)

- Raj Vasani. (મોરી ચા.) 😊😉

मेरी अधूरी मोहब्बतें....

(4)

मार्च का महीना तो वैसे ही बङा रोमांटिक होता है...कामदेव का वसंत...फगुनहट की बयारें...उपर से हमारे जन्मदिन के सिर्फ़ छह दिनों बाद ही पगली का भी जन्मदिन। हमारे बींसवे साल का पहला दिन...पगली के आने की तैयारियाँ...रात की ज़बरदस्त पार्टी के बाद अस्त-व्यस्त पङा दोनों कमरा...जहाँ-तहाँ बिखरे बीयर की बोतलें...केक से सने गंदे कपङे और बेडशीट...मन्चुरियन ड्राय....सिगरेट के बाक़ी बचे फिल्टर्स...खैर बङे मेहनत से एक कमरे की साफ़-सफ़ाई करके रोमांटिक माहौल तैयार किया गया। उत्तेजना अपने चरम पर थी...हमारी ऐसी हालत तो तब भी न हुवी थी जब हम पोलिटिकल सायन्स की परीक्षा देने जा रहे थे। नर्वस पर संतुलन के लिए डेस्कटाॅप पर किशोर दा बजाए गये...एक-एक मिनट के बीस-पच्चीस बरस गुजरने के बाद दरवाजे पर दस्तक हुवी। विलियम वर्ड्सवर्थ लिखे हैं कि हर प्रेमी को अपनी प्रेमिका ट्राॅय की राजकुमारी नज़र आती है...हम भी अपवाद न थे...और हो भी कैसे सकते थे...पगली के उस रूप को अब बंद आँखों से ही महसूस किया करता हूँ। एक कुंवारे के घर में उसकी प्रेमिका की उपस्थिति शराब से भी ज्यादा असर दिखाती है...हमारी साँसें कब जुङी...कब हम एक-दूसरे के कलेजे में उतरे...कुछ ख्याल नहीं...ख्याल है तो बस पगली के फोन में शाम पाँच बजे मनहुस अलार्म का बजना। अब जाना उसकी मज़बूरी थी सो पगली को घर तक पहुँचा आना हमारी भी। काश हमारे पास इतनी ताकत होती कि समय को कुछ देर के लिए थाम सकते...पर वो बेरहम रफ़्तार चलता रहा और हमारे कलेजे पर पहाड़ जैसा बोझ रखता गया। भारी मन से बाहर निकलके हमने ऑटो लिया और पगली को पहुँचा आया।
मुद्दतें गुजरी पर वो दिन लौटकर न आ सका...जबकि वैसी तमाम मनहुस शामें आई और हम उन शामों को हार्ड राॅक कैफ़े में बडवाइज़र मैग्नम, मन्चुरियन ड्राय, क्लासिक माइल्ड, और अपने बेहिसाब तन्हा ग़मों के साथ रातों में तब्दील करते रहे...और किसी अंज़ान शायर के शब्दों के साथ बेकसूर पगली पर क़यामत तक ये तोहमत लगाते रहे, " ये तेरे आँखों की तौहीन है...कि तेरा आशिक़ शराब पीता है"।
अब बारी थी पगली के उन्नीस बरस पूरा करके आगे बढ़ जाने का...ये 2012 आगे चलके इतना अहम और बेरहम हो जानेवाला था...मालूम न था। खैर वक़्त था पगली के हैप्पी जन्मदिन का...पर हम महज़ पाँच-सात दिनों में ही फ़िर से कंगाल हो चुके थे...होते भी क्यों न...चाहनेवालों के गुटबाजी ने पार्टियों की संख्या को बेतरह बढ़ा जो दिया था! हम अबतक चार्वाक के उधार लेकर घी(शराब) पीनेवाली कहावत को चरितार्थ करने लगे थे...सो पगली के जन्मदिन पर उसी से उधार लेकर पार्टी दिया गया। आगे भारी मात्रा में परीक्षाएँ हमारा इंतज़ार कर रही थी...पर हमने कभी इनका बहुत लोड न लिया...परिणाम बढ़िया कहे जाने लायक था भी। सेशन बदलते ही यूनिवर्सिटी में अगले चुनावों का दौर...और ये दौर बहुत खास इसलिए कि इसने पगली को हमसे बिना वज़ह बहुत दूर जाते देखा...इसने हमें कागज़ों पर बर्बाद होते देखा...इसने हमें अपने ही पैर पर कुल्हाङी चलाते कालिदास बनते देखा...इसने हमें नशे में बेतरह डूब जाते देखा...इसने हमें संघी बेहूदगी से बाहर आते देखा...इसने हमें कई चेहरों में अपने पगली को खोजते देखा...इसने नशे में मदहोश कम बेहोश ज्यादा वाली हालत में सङकों-गलियों से हमें उठाते दोस्तों की वो काली रातें भी देखा।
आज भी उन दिनों और रातों की यादें आत्मा को कलपा के रख देती है...अब आज और न लिखा जाएगा...नेतागिरी और मोहब्बतों की उन दर्दीली यादों ने कंठ को भी और उँगलियों को भी जाम करके रख दिया है।
2012 का वो मनहुस अक्टूबर महीना...चुनावी भागदौड़ अपने चरम पर...पगली की ताबङतोङ शिकायतें...खैर तमाम व्यस्तता को परे हटा पगली से माॅडल ध विलेज मिला गया। हमें मालूम न था कि पगली आखिरी मुलाकात करने आई है...उस हसीन मुलाकात के बाद अचानक ही पगली को काॅमर्स छोङके पत्रकारिता का शौक चरचराया और वो हमें अलविदा कहके सुरत चल पङी। तब हम इतने बुरे न थे...पर अभीतक हम वज़ह की तलाश में कोलंबस हुवे जाते हैं। पगली ने हमें नज़रअंदाज़ करना शुरू किया...और जैसा की होता है कि किसीको अगर सबसे बडी़ गाली बिनबोले देनी हो तो उसे नज़रअंदाज़ करते रहो... चुनावी जिम्मेदारियों के कारण हम अपने तक़लीफ़ को अंदर में बाँध के रखे। ये वो समय था जब हमें उसकी सबसे ज्यादा ज़रूरत थी...नेतागिरी ने पुराने दोस्तों को दुश्मन बना दिया था...हम बेहद अकेले थे...सबकुछ जानते हुवे भी पगली हमें मिनट-दर-मिनट मरता छोङ गई वो भी वज़ह बताए बिना।
एक अर्से बाद वो फ़िर से आई ज़िंदगी में पर अब तमाम छलावे और शर्तें लिए हुवे...और इस अर्से में हमने कभी "पिया" तो कभी "राजकुमारी" में अपने पगली को खोज़ा। एक असफ़ल प्रेमी चलता-फ़िरता न्यूक्लियर बम होता है...सो हमारे फटने से पगली के अलावा हर वो कोई झुलसता रहा जो हमारे क़रीब आया।
मुद्दतें गुजरी...हम अपने पगली को न पा सके...वो वापस आई भी तो "पुराने बोतल में नई शराब' के तर्ज़ पर...अफ़सोस कि हमने हमेशा ही पुरानी शराब को पसंद किया है...परिणाम ये कि हम मौत तक के लिए नशे के आगोश में जा पहुँचे...और अब उसकी दिखावटी क़ोशिशें नाकाफ़ी होनी ही थी।

(जारी...)

- Raj Vasani. (મોરી ચા.) 😊😉