Saturday, 2 April 2016

"गद्दारी हमारे खून में है"

(5)

लौहोर षणयंत्र केस में जयगोपाल क्यूंकि सैंडर्स हत्याकांड के वक्त मौजूद था इसलिए उसकी भगत सिंह और राजगुरु के खिलाफ गवाही महत्वपूर्ण थी। उसी के साथ 'फणीन्द्र नाथ घोष' ने भी इन लोगो के खिलाफ गवाही दी थी। फणीन्द्र नाथ घोष की गवाही ज्यादा महत्वपूर्ण थी क्यों की वो एचएसआरऎ (HSRA ) के संस्थापक सदस्य थे बल्कि वो बिहार यूनिट के प्रमुख और HSRA के 7 सदस्यीय  केंद्रीय समिति के भी सदस्य थे। पुलिस के छापे के दौरान उसे कलकत्ता में पकड़ा गया था। घोष को, एचएसआरऐ की पूरी अंदरुनी जानकारी थी और वो काफी क्रांतिकारियों को जानता भी था। उसकी निशान देही पर देश भर में छिपे क्रांतिकारियों के ठिकाने पर छापे पड़े थे और उसके साथ उसने उन लोगो को भी चिन्हित किया था जो बम बनाने में सहायक थे। फणीन्द्र नाथ की गवाही ने क्रांतिकारियों की कमर तोड़ने का काम किया था। चंद्रशेखर आज़ाद के झाँसी के ठिकाने का भी उसे पता था लेकिन आज़ाद पुलिस के छापा डालने से पहले ही झाँसी से निकल कर बच गए थे।

मैंने फणीन्द्र नाथ घोष को काफी समझने की कोशिश की है। मैंने यह भी समझने की कोशिश की है क्यों उस ऐसे एक महत्वपूर्ण क्रांतिकारी, वक्त पड़ने पर अपनी आस्था और विश्वास से छल कर बैठा और अपने ही आंदोलन और साथियों की पीठ में छुरा भोंक दिया था। फणीन्द्र नाथ कोई मामूली क्रांतिकारी नही थे, वो HSRA के जन्म लेने से पहले ही बंगाल और बिहार में क्रन्तिकारी गतिविधियों में लगे हुए थे। जब 9 सितम्बर 1928 को पंजाब, यूपी, बिहार बंगाल के क्रन्तिकारी, फिरोज शाह कोटला मैदान, दिल्ली में मिले थे तब चन्द्रशेखर आज़ाद , भगत सिंह, सुखदेव, के साथ फणीन्द्र नाथ भी मौजूद थे और विभिन्न क्षेत्रीय क्रन्तिकारी संघटनो का विलय कर के, एचएसआरऎ का गठन किया था। वहीं पर, फणीन्द्र नाथ घोष को केंद्रीय समिति में लेने का और उसे बिहार का प्रमुख बनाये जाने का भी निर्णय लिया गया था।

फणीन्द्र नाथ, अपने अन्य साथी क्रांतिकारियों से उम्र में काफी बड़े थे और इसलिए उनके साथी उन्हें आदर से 'दद्दा' कह कर बुलाते थे। दिल्ली असेम्बली बम कांड में भगत सिंह की गिरफ्तारी और बाद में लौहोर बम फैक्ट्री पकड़े जाने पर, जयगोपाल की शिनाख्त पर खुद की और सुखदेव की गिरफ्तारी से, फणीन्द्र नाथ घोष ने यह आंकलन कर लिया था की HSRA के सभी प्रमुख सदस्य गिरफ्तार हो ही चुके है और यदि आज़ाद भी गिरफ्तार हो जाते है, तो HSRA का भविष्य खत्म हो जायेगा। खुद फणीन्द्र नाथ घोष, पहले से ही हत्या और डकैती की घटनाओ में मुलजिम थे इसलिए पूरी माफ़ी की शर्त पर, वह ब्रिटिश पुलिस के गवाह बनने को तैयार होगये थे। फणीन्द्र नाथ घोष को गद्दारी की सजा का भी पूरा भान था इसलिए सबसे पहले उसने चंद्रशेखर आज़ाद के सारे ठिकानो का खुलासा किया था लेकिन चंद्रशेखर आज़ाद, शुरू से ही सजग थे लेकिन उनके सारे ठिकानो का पता, फणीन्द्र नाथ घोष को भी नही मालूम था।

गवाह बनने के बाद से ही चंद्रशेखर आज़ाद ने जयगोपाल के साथ, फणीन्द्र नाथ घोष को मार देने का फैसला कर लिया था और यह संदेश सारे बचे हुए क्रांतिकारियों को भी दे दिया गया था। भुसावल बम काण्ड की सुनवाई के दौरान जयगोपाल के साथ फणीन्द्र नाथ घोष को भी गोली से मारने की योजना थी लेकिन सिर्फ जयगोपाल को ही गोली लग पायी थी और घोष बच गया था।

फणीन्द्र नाथ घोष ने केवल अपनी जान बचाने के लिए ही गवाही नही दी थी उसने उसकी पूरी कीमत भी वसूली थी। भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को फांसी में लटकाने में सफल गवाही देने के लिए ब्रिटिश सरकार ने उसको, उसकी सुरक्षा के लिए पुलिस का गार्ड और साथ में, जिला चंपारण में 50  एकड़ जमीन भी इनाम स्वरूप दी थी।

घोष की गद्दारी से आक्रोशित बिहार के क्रांतिकारियों ने हाजीपुर के गांधी आश्रम में एक बैठक की थी और वहां उसको मौत के घाट उतारने की कार्य योजना बनाई गयी थी। वहां बिहार के एक मशहूर क्रन्तिकारी, 'योगेन्द्र शुक्ल', जो की HSRA के संस्थापक सदस्य और चंद्रशेखर आज़ाद के मित्र भी थे, के भांजे, 'बैकुंठ शुक्ल' इस कार्य को करने के लिए सामने आगये और अपने अग्रजो से इसका आग्रह किया था। 25 वर्षीय बैकुंठ शुक्ल, जिला मुफ्फरपुर के जलालपुर गाँव(अब जिला वैशाली में) के थे। उन्होंने गांधी जी के सत्याग्रह आंदोलन में भाग लिया था और जेल भी गए थे। वहां भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव की फांसी के बाद से उनका गांधी जी की नीतियों से मोह भंग हो गया था।गांधी इरविन के बीच हुए समझौते के तहत जब वो जेल से छोड़े गए तब वह जेल से निकल कर, HSRA के क्रांतिकारियों से जुड़ गए थे।

9 नवम्बर 1932 को जब फणीन्द्र नाथ घोष, जिला बेतिया के मीना बाजार में बैठे हुए थे तब उस पर बैकुंठ शुक्ल ने, एक प्राणधातक हमला किया जिससे फणीन्द्र नाथ घायल होकर 3 दिन बाद, अस्पताल में मर गया था। फणीन्द्र नाथ घोष को मालूम था की किसने उसको मार है लेकिन गद्दारी की हीन भावना से ग्रसित घोष ने, अपने डाईंग डिकलरेशन में किसी का भी नाम लिया था। बाद में बैकुंठ शुक्ल को गिरफ्तार करके, घोष की हत्या का मुकदमा चलाया गया और उनको 28  वर्ष की आयु में, 14 मई 1934  को गया के जेल में फांसी दे दी गयी थी।

इस प्रकार गांधी की नीतियों को दुत्कार कर बने क्रन्तिकारी बैकुंठ शुक्ल ने एक गद्दार फणीन्द्र नाथ घोष की हत्या करके, उसको गद्दारी की सज़ा दी थी।

(पूर्णः) :-...

Wednesday, 30 March 2016

"गद्दारी हमारे खून में है"

(4)

एचएसआरऐ(HSRA) के कमांडर चन्द्रशेखर आज़ाद, जहां भारत की स्वतंत्रता और इसको हासिल करने के लिए बड़े पैशनेट थे वहीं वो व्यवहारिक भी थे। उन्हें इसका पूरा एहसास था की किसी भी सशस्त्र भूमिगत आंदोलन में साथियों का पुलिस द्वारा पकड़े जाने का हमेशा ही अंदेशा रहेगा और पुलिस की प्रतारणा के आगे कमजोर साथी टिक नही पाएंगे। इसलिए उन्होंने आदेश दिया था की जब कोई क्रन्तिकारी, कार्यवाही के दैरान पकड़ा जाये, तो वह अपने हिस्से की भूमिका स्वीकार कर ले लेकिन किसी भी हालत में अन्य साथियो और HSRA की गतिविधियों के बारे में मत बताये। इन आदेशो की अवेहलना करने वाले को मृत्यु दण्ड देने की चेतावनी भी दे रक्खी थी।

जब चन्द्रशेखर आज़ाद भूमिगत हुए थे तब उन्होंने सभी साथियों को छुप जाने को कहा था और कुछ विश्वनीय लोगो को बम और हथियारों को छिपाने का काम दे दिया था। इसी एक प्रयास में भुसावल रेलवे स्टेशन पर दो क्रन्तिकारी भगवानदास माहौर और सदाशिव राव मलकापुरा पकड़ लिए गए थे। ये सदाशिव राव वही है जिन्होंने बाद में चन्द्रशेखर आज़ाद की माँ को रक्खा था। इन दोनों के बारे में पुलिस को, जय गोपाल और एक दूसरे गवाह फणिचन्द्र ने, HSRA के सदस्य के रूप में बता दिया था।

भगवानदास और सदाशिव दोनों पर जलगांव में मुकदमा चलाया गया, जो अब 'भुसावल बम केस' के नाम से जाना जाता है। जब सदाशिव को पता चला की 21 फरवरी 1930 को उनके विरुद्ध गवाही देने लौहोर पुलिस के साथ, मुखबिर जयगोपाल और फणीन्द्र घोष आने वाले है तो इन दोनों को अदालत में ही मारने का मन बनाया था। उन्होंने, उनका निः शुल्क मुकदमा लड़ रहे, झाँसी के प्रसिद्ध वकील श्री र. वि. धुलेकर, के माध्यम से, चन्द्रशेखर आजाद के पास यह संदेश भिजवाया। तब आजाद ने अपने एक फरार क्रांतिकारी साथी भगवतीचरण वोहरा को वकील के वेश में उनके पास भेजकर कहलवाया कि 'गोली चलाने का काम भगवानदास करेंगे क्योंकि एक ही मामले में दो आदमी फाँसी पाएँ, यह ठीक नहीं रहेगा।'

योजनानुसार 20 फरवरी की शाम को, सदाशिवराव के बड़े भाई शंकर राव मलकापुर, चावल के बड़े कटोरे के नीचे एक भरी हुई पिस्तोल रखकर, जेल में उन लोगों को दे आये। अगले दिन अदालत में भोजनावकाश के समय भगवानदास माहौर ने जयगोपाल और फणीन्द्र पर हमला कर दिया, जिसमें जयगोपाल को गोली लगी और वह घायल हो कर गिर गया लेकिन वो मरा नहीं था। भगवानदास उस पर और गोली उस दागते लेकिन उनकी पिस्तौल जाम हो गई थी।

इस घटना के बाद जय गोपाल सहित सभी गद्दारो की सुरक्षा, ब्रिटिश पुलिस ने बढ़ा दी, जिससे और हमले करने में क्रन्तिकारी सफल नही हो पाये थे।

भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को फांसी दिलवाने में मदद करने के ऐवज मे ब्रिटश सरकार ने 1931 में गद्दार, जय गोपाल को  20,000 रुपये इनाम में दिए थे। उसके बाद जय गोपाल कहा इतिहास में दफन हो गया, मुझे नही पता चला है।

मैंने बहुत तलाश की लेकिन जय गोपाल के आगे के जीवन के बारे में कुछ भी लिखा नही मिला है। यदि किसी के पास कोई सुचना हो तो मुझे अवश्य बताइयेगा।

(क्रमशः) :-

Monday, 28 March 2016

"गद्दारी हमारे खून में है"

(3)

क्रमशः से आगे

भगत सिंह और बुटकेश्वर दत्त द्वारा दिल्ली की असेम्बली में बम फोड़ने का नतीजा यह हुआ था की ब्रिटिश सरकार घबरा गयी थी और उनकी पुलिस ने देश भर में "एचएसआरऐ" के ठिकानो पर छापे मारने शुरू कर दिए थे। ऐसे ही एक छापे में, लौहोर की बम फैक्ट्री पकड़ी गयी थी और सुखदेव थापर , किशोरी लाल और जय गोपाल गिरफ्तार कर लिए गए थे, लेकिन एक सदस्य, यशपाल वहां से बच निकलने में सफल हो गए थे। यशपाल, जो बाद में हिंदी के एक बड़े लेखक बने थे, वे एक वामपंथी थे और लौहोर में,  कालेज के दिनों से ही भगत सिंह और सुखदेव थापर से मिले थे। वे केंद्रीय भूमिका में न होकर सहयोगी की भूमिका में ही थे। इस के बाद ही,  "एचएसआरऐ" की दूसरी बम फैक्ट्री, सहारनपुर में पकड़ गयी थी। यह संदेह हमेशा ही रहा है की सहारनपुर स्थित बम फैक्ट्री की मुखबरी लौहोर बम फैक्ट्री पकड़े जाने के बाद हुयी थी। इन दो फैक्टरियों के पकड़े जाने से "एचएसआरऐ" को बड़ा धक्का लगा था और यही से कमजोर क्रांतिकारियों में से गद्दार निकलने शुरू हुए थे।

सबसे पहले जो गद्दार टुटा था वो 'जय गोपाल' था। जय गोपाल का टूटना बहुत महत्वपूर्ण था क्यूंकि सैंडर्स की हत्या के दल में वो भी शामिल था। लौहोर में उस दिन, एसएसपी स्कॉट को मारने की पूरी योजना, चंद्रशेखर आज़ाद की थी। उस योजना के अनुसार, जय गोपाल को सकॉट को पहचानना था। पहचान के बाद, भगत सिंह को पहली गोली मारनी थी और उनकी गोली चलने के बाद, राजगुरु को गोली चलानी थी। चंद्रशेखर आज़ाद को इन दोनों को कवर करना था ताकि वो लोग गोली मार कर भाग जाए।

जय गोपाल ने सॉन्डर्स को सकॉट समझ कर, भगत सिंह को इशारा किया था लेकिन भगत सिंह ने जब देखा तो वह उसे सकॉट के रूप में पहचान नही पाये थे। इसी वजह से भगत सिंह गोली चलाने में हिचकिचा गये थे। इसलिए देरी होता देख कर राजगुरु ने सॉन्डर्स को पहले गोली मारी थी। राजगुरु के गोली चलने के बाद ही भगत सिंह ने सॉन्डर्स को गोली मारी थी। जब वो भाग रहे थे तब हेड कांस्टेबल चन्ना सिंह ने उनका पीछा किया और तब चंद्रशेखर आज़ाद ने, बाकी साथियों को भागने का मौका देते हुए, चन्ना सिंह की गोली मार कर हत्या कर दी थी।

जय गोपाल से जेल में जब उसकी पत्नी और माँ मिलने आई, तो उनके द्वारा पुलिस ने उसपर दबाव बनाया और प्रलोभन दिया था। आखिर में जय गोपाल, अपनी पत्नी और माँ के कहने पर मान गया और वह गद्दारी करने को तैयार हो गया था। जय गोपाल, अपनी पत्नी और माँ का रोना बर्दाश्त नही कर पाया था और उसने पुलिस को, "एचएसआरऐ" के सारे भेद खोल दिए थे।

उसकी निशान देही पर ही भगत सिंह और राजगुरु की, सॉन्डर्स की हत्या करने वाले अभियुक्त के रूप में पहचान हुयी थी। यहां यह गौर करने वाली बात है की इस काण्ड में, सुखदेव शामिल नही थे लेकिन फिर भी जय गोपाल ने योजना बनाने वाले के रूप में, सुखदेव का नाम लिया था। उस वक्त, पंजाब पुलिस के लिए, सुखदेव सबसे बड़ा नाम था क्यूंकि वो ही "एचएसआरऐ" के सबसे प्रभावशाली संगठक थे। इसलिए अदालत में यह केस, भगत सिंह के नाम पर नही "द कोर्ट वर्सेज सुखदेव एवं अन्य" के नाम से चला था।   

“In the court of The Lahore Conspiracy Case Tribunal, Lahore, constituted under Ordinance no III of 1930: The Crown – Complainant versus Sukhdev and others”.       

(क्रमशः) :-

Friday, 25 March 2016

"गद्दारी हमारे खून में है"

(2)

आज कल भारत में गद्दारी की फिजा चल रही है। यह देख कर लोग अचंभित है की इतने सारे गद्दार हमारे बीच में थे और हम लोगो को इसका एहसास ही नही हुआ। यह यकीनन बेहद अफसोसनाक और चिंतनीय है। मुझे में, गद्दारो के होने से इतना आक्रोश नही है जितना इस बात पर है की लोग इसको किसी वाद के प्रति आस्था या अभिवयक्ति की आज़ादी के नाम पर, निर्लज़्ज़ता और दम्भ से, भारतीय समाज से उनके गद्दार होने को प्रतिष्ठित कराना चाहते है। 

इसी पृष्टभूमि में मैंने बीते दिनो ककाोरी काण्ड में उन गद्दारो का जिक्र किया था जिनकी गद्दारी से रामप्रसाद बिस्मिल सहित 4  राष्ट्रभक्त क्रांतिकारियों को 1927 में फांसी की सज़ा मिली थी। इसके 4 साल के भीतर ही, 1931 में एक बार फिर गद्दारो की वजह से ही महान क्रन्तिकारी भगत सिंह, सद्गुरु, और राजगुरु को फांसी दीगयी थी।  

चंद्रशेखर आज़ाद की इच्छा के विरुद्ध, भगत सिंह ने बुटकेश्वर दत्त के साथ, "एचएसआरऐ" (HSRA) की आवाज़ देश भर में फ़ैलाने के लिए, "दिल्ली के केंद्रीय लेजिस्लेटिव असेंबली' में धमाके वाले बम फोड़ कर गिरफ्तारी दी थी। तब भगत सिंह को यह अंदाज़ा नही था की वो लाहोर में हुए एएसपी सेंडर्स की हत्या का भी मुक़दमा उन पर कायम होगा और उन्हें फांसी होगी।

भगत सिंह के बम फोड़ने के बाद से ही पुलिस "एचएसआरऐ" के सदस्यों के पीछे पड़ गयी थी। चन्द्र शेखर आज़ाद तथा अन्य "एचएसआरऐ" सदस्य गिरफ्तारी से बचने के लिए अंडरग्राउंड हो गए थे और पुलिस उनके ठिकानो पर लगातार छापे मार रही थी। इसी क्रम में लौहोर में स्थित बम फैक्ट्री पकड़ी गयी थी और उसमे सुखदेव थापर , किशोरी लाल और जय गोपाल को गिरफ्तार कर लिया गया था। उसके बाद, सहारनपुर स्थित बम फैक्ट्री भी पकड़ी गयी और इन दोनों फैक्ट्री के पकड़े जाने के बाद ही भगत सिंह, सुखदेव थापर और राजगुरु पर सेंडर्स की हत्या का मुक़दमा कायम हुआ था। दरअसल लौहोर बम फैक्ट्री में गिरफ्तारी के बाद से ही गद्दार सामने आये थे और उनकी गवाही ने भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को फांसी पर लटकवाया था।

वैसे तो कई लोगो ने गवाही दी थी लेकिन जिन गवाहों के बयान ने इन तीनो क्रांतिकारियों को फांसी की सजा दिलवाई थी वह "एचएसआरऐ" के सदस्य थे और उनके साथी थे। यहां इन गद्दारो के बारे में बात करने से पहले एक नाम की चर्चा जरूर करूंगा जिनका नाम अक्सर लोग लेते है और मानते है की उनकी गवाही पर भगत सिंह सहित तीनो को फांसी हुयी थी। 

भगत सिंह की फांसी के पीछे प्रसिद्ध लेखक खुशवंत सिंह के पिता, 'सर शोभा सिंह' का नाम बराबर लिया जाता है, जो की गलत है। यहां एक बात समझ लीजियेगा की दिल्ली में बम फोड़ना एक अलग केस था और लौहोर में सैंडर्स की हत्या बिलकुल अलग केस था। सर शोभा सिंह, जो की ब्रिटिश राज्य के कृपा पात्र थे और बड़े ठेकेदार थे, वे उस दिन, जिस दिन बम फोड़ा गया था असेंबली में मौजूद थे। उन्होंने ही भगत सिंह और बुटकेश्वर दत्त की शिनाख्त की थी और उन्होंने जो पूरा घटना क्रम बताया था, उसी के आधार पर भगत सिंह और बुटकेश्वर दत्त को 12 जून 1929 को, असेंबली में बम फोड़ने के इल्जाम में, आजीवन कारावास हुयी थी। हाँ, यहाँ यह बताना जरुरी है की अदालत ने अपने फैसला देने में, गवाहों की गवाही में दिए गए घटनाक्रम पर संदेह व्यक्त किया था लेकिन क्यूंकि खुद भगत सिंह और बुटकेश्वर दत्त ने अपनी गिरफतारी दी थी इसलिए उन्हें मुलजिम माना गया था। 

भगत सिंह, सुखदेव थापर और राजगुरु पर सैंडर्स की हत्या का मुकदमा, असेंबली बम कांड में सजा दिए जाने के बाद ही चालू हुआ था इसलिए उनकी फांसी के जिम्मेदार गद्दारो की कहानी उसके बाद ही शुरू होती है। इन तीन क्रांतिकारियों को फांसी दिलाने वाला केस "लौहोर षड्यंत्र केस" के नाम से जाना जाता है।

(क्रमशः) :-

Sunday, 20 March 2016

"गद्दारी हमारे खून में है"

(1)

किसी भी राष्ट्र की अस्मिता और उसके अस्तित्व की रक्षा के लिए उसका सबसे प्रचण्ड अस्त्र उसके शहीदों और उनके साथ गद्दारी करने वालो की याद होती है

भारत उन दुर्भाग्यशाली राष्ट्रों में से रहा है जहां राष्ट्रभक्त क्रांतिकारियों को तो भुलाया ही गया है वहीं उनके साथ गद्दारी करने वालो को भी भुला दिया गया है। वे या तो इतिहास की स्मृति से छांट दिए गए है या फिर उन्हें स्वतंत्रता के बाद फिर से प्रतिष्ठित होने का अवसर दिया गया है।

इसमें जितना दोष कांग्रेस और उनके वामपंथी इतिहासकारो का है, उतना ही दोष भारतीय समाज का भी है। ऐसा संभव ही नही था की उस काल में गद्दारो को भारतीय समाज जानता नही था लेकिन कालांतर में स्वार्थी और क्षमा की संस्कृति से लदे समाज ने, गद्दारो को भुला कर, आगे आने वाली पीढ़ी के साथ बड़ा अन्याय किया है। भारतीय क्रांतिकारियों के इतिहास में  'काकोरी काण्ड', 'लाहोर काण्ड' और 'चंद्रशेखर आज़ाद का हत्याकांड', 3 महत्वपूर्ण घटनाये हुयी है।जिसमे ककोरी और लाहोर कांड पर तो मुकदमे चले थे और गद्दारो की ही गवाही पर क्रांतिकारियों को फांसी तक की सजा हुयी थी। इन गद्दारो के नाम सार्वजनिक थे, लेकिन इसके बाद भी आज शायद ही कोई हो जो उन लोगो के बारे में जानता होगा या उनका भविष्य में क्या हुआ, इसके बारे में कोई उत्सुकता ही बची है। चंद्रशेखर आज़ाद की हत्या ने क्यूंकि कभी अदालत नही देखी इसलिए उसके गद्दार हमेशा बचते रहे है। इसके बाद भी 1931 के बाद से ही कुछ लोगो पर हमेशा शक रहा है लेकिन 70 के दशक बाद सब मौन हो गए है।

चंद्रशेखर आज़ाद की हत्या के गद्दारो पर फिर कभी लिखूंगा लेकिन आज काकोरी कांड में क्रांतिकारियों को फांसी दिलवाने वाले भारतीयों का परिचय, आप लोगो से जरूर कराऊंगा।

9 अगस्त 1925 को लखनऊ के पास काकोरी रेलवे स्टेशन के पास, राम प्रसाद 'बिस्मिल' के नेतृत्व वाली "हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन"(HRA) ने ब्रिटिश सरकार के खजाना लूटने के लिए, ट्रेन पर सशस्त्र डकैती डाली थी। इस काण्ड से तत्कालीन सरकार हिल गयी थी और पुरे देश से "हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन" के सदस्यों को इस डकैती के इल्जाम में गिरफ्तार कर लिया गया। कुल 40 लोगो को इस काण्ड में दोषी होने के संदेह में गिरफ्तार किया गया था। इस डैकैती में शामिल अशफाख खान और सचिन्द्र बक्शी उस वक्त पकड़ में नही आये और ट्रायल समाप्त होने के बाद ही वे गिरफ्तार हो पाये थे। उसमे शामिल चन्द्रशेखर 'आज़ाद' ही अकेले ऐसे थे जिन्हे अंत तक पुलिस गिरफ्तार नही कर पायी थी।

ब्रिटिश सरकार की ओर से लखनऊ के "पंडित जगत नारायण मुल्ला", जो की कश्मीरी पंडित थे, सरकारी वकील थे। पंडित मोतीलाल नेहरू ने उनसे इन क्रांतिकारियों के विरुद्ध मुक़दमा न लड़ के, उनके लिए मुकदमा लड़ने को कहा था लेकिन पंडित जगत नारायण मुल्ला की रामप्रसाद 'बिस्मिल' से पुरानी अनबन थी इसलिए उन्होंने उनके पक्ष में मुकदमा लड़ने के बजाये सरकारी वकील बनना पसंद किया था। दरअसल जब 1916 में 'बाल गंगाधर तिलक', जो कांग्रेस के गर्म दल के थे, का लखनऊ आगमन हुआ था तब कांग्रेस के नरम पंथी, जिसमे जगत नारायण मुल्ला प्रमुख थे, जिनका कांग्रेस में वर्वस्य था, नही चाहते थे की बाल गंगाधर तिलक का लखनऊ में सार्वजनिक अभिनंदन और स्वागत हो। लेकिन रामप्रसाद 'बिस्मिल' ने नरम पंथियों की बात मानने से इंकार कर दिया था और स्वयं उन्हें लेने रेलवे स्टेशन गए थे। तिलक का पुरे लखनऊ शहर में शानदार स्वागत और अभिनंदन हुआ था जिससे नरमपंथी कांग्रेसी काफी आहात हुए थे।

जब ब्रिटिश सरकार ने कोर्ट में इल्जाम दाखिल किया था तब 4 लोगो के नाम चार्जशीट हटा दिए गए थे। बनारस के 'दामोदर सेठ' को खराब बीमारी के आधार पर छोड़ दिया गया और बाकि तीन क्रन्तिकारी और भी छोड़े गए थे। वो थे,

"उरई के वीरभद्र तिवारी", 
"इलाहबाद के ज्योति शंकर दीक्षित" और 
"मथुरा के शिवचरण लाल".

इन तीनो पर ही उस वक्त यह संदेह था की ये ब्रिरिश सरकार की सहायता करने के आश्वासन पर बचा लिए गए थे।

इसके आलावा 2 क्रन्तिकारी सरकारी गवाह बन गए थे,

"शाजहंपुर के बनारसी लाल और इंदुभूषण मित्रा" और 
"रायबरेली के बनवारी लाल", जो कम सजा के आश्वासन पर सरकारी वकील की मदद करने को तैयार हो गये थे.

इन गद्दारो की मदद से 'रामप्रसाद बिस्मिल', 'ठाकुर रोशन सिंह', 'राजेन्द्र नाथ लहरी', 'अशफ़ाक़ुल्ला खान' को फांसी की सजा हुयी थी.

इसके साथ ही 'सचिंद्रनाथ सन्याल' और 'सचिंद्रनाथ बक्शी' को कालापानी, 'मन्मथ नाथ गुप्ता' को 14 साल, 'योगेश चन्द्र चटर्जी', 'मुकुन्दी लाल', 'गोविंद चरण कर', 'राज कुमार सिंह' और 'राम कृष्णा खत्री' को 10 साल, 'विष्णु चरण दुबलिश', 'सुरेश चरण भट्टाचार्य' को 7 साल, 'भूपेन नाथ सान्याल', 'प्रेम कृष्णा खन्ना' को 5 साल और 'केशब चक्रवर्ती' को 4 साल की कारावास हुयी थी.

आज चंद नामो को छोड़ कर न हमे क्रन्तिकारी याद है और न ही उनकी याद है जिन्होंने इनके साथ गद्दारी कर के भारत माँ के साथ गद्दारी की थी।

क्रन्तिकारीयों को भूल जाना अपराध है लेकिन गद्दारो को भूले तो आत्महत्या होगी।

(क्रमशः) :-...

Monday, 14 March 2016

'Meet John Doe'

'Meet John Doe'

आज से 5 साल पहले अंग्रेजी की एक मशहूर ब्लैक & वाइट फ़िल्म  'Meet John Doe' देखी थी। उसके निर्देशक फ्रैंक कैपरा थे और गैरी कूपर ने उसमे मुख्य भूमिका निभायी थीं।

फ़िल्म का कथानक तो कुछ और था लेकिन अपनी बात कहने के लिए आपकी मुलाकात 'जॉन डो' से कराता हूँ, जो वास्तविकता में जॉन विल्लोहबी नाम का आदमी है। वो एक बेरोजगार और फटेहाल आदमी है, जो एक अजनबी शहर में आया हुआ है। शहर का मौहोल राजनीती और सत्ता की आपा धापी से गर्म है। उसी शहर में एक प्रभावशाली अख़बार होता है जिसका मालिक 'नॉर्टन' है, जो प्रभावशाली भी है और राजीनीति में दखल भी रखता है। उसी अख़बार में एक महिला पत्रकार 'मिशेल' भी होती है, जो उस वक्त अपने खुद के अस्तित्व और जीविका की लड़ाई लड़ रही होती है।

मिशेल, अपनी नौकरी बचाने के लिए, एक काल्पनिक चरित्र 'जॉन डो' के नाम से, एक फ़र्ज़ी पत्र अख़बार में छाप देती है, जिसमे जॉन डो, समाज में व्याप्त कुरीतियों और भरष्टाचार के विरोध में, क्रिसमस के दिन आत्महत्या करने की घोषणा करता है।

जब वह पत्र अख़बार में छपता है तो शहर में सनसनी फ़ैल जाती है और लोग जॉन डो को जानने को आतुर हो जाते है। तब मिशेल उस फटेहाल बेरोजगार आदमी जॉन विल्लोहबी को 'जॉन डो' बना कर जनता के सामने पेश करती है। अख़बार मालिक नॉर्टन इसमें राजिनैतिक भविष्य देखता है और  मिशेल की तनखाह बढ़ा देता है। उसके ऐवज में वो जॉन डो की आवाज़ बन जाती है और जॉन डो के नाम से लेख और भाषण लिखने लगती है।

लेकिन शहर के प्रतिद्वन्दी अख़बार और कुछ सजग नागरिको को यह शक होता है की जॉन डो फ़र्ज़ी है।वो लोग पुरे मामले की जांच करने लगते है ताकि जॉन डो, मिशेल और नॉर्टन की असिलयत सबके सामने उजागर की जासके। इसी घटनाक्रम में नॉर्टन, जॉन डो को आगे करके  एक राजिनैतिक पार्टी बनाने की घोषणा कर देता है। जिस दिन इस पार्टी का उद्घाटन होना होता है उस दिन, जॉन डो को एहसास होता है की नॉर्टन अपने स्वार्थ के लिए उसे इस्तमाल कर रहा है तो वह निश्चय करता है की उद्घाटन समारोह में वो सबको जॉन डो, नॉर्टन और मिशेल की असिलयत बता देगा और फिर शहर से चला जायेगा। यह बात जब नॉर्टन को पता चलती है तो नॉर्टन पहले ही जनता को बता देता है की जॉन डो, धोखेबाज़ और फ़र्ज़ी है और जॉन विल्लोहबी ने जॉन डो बन कर उसको और जनता के विश्वास के साथ धोखा दिया है।

अब जनता का सारा आक्रोश उस जॉन डो की तरफ उमड़ पड़ता है। इस सब से दुखी और हताश जॉन विल्लोहबी, जॉन डो के पहले फ़र्ज़ी पत्र की घोषणानुसार, सबसे ऊँची ईमारत से कूद कर, आत्महत्या करने का निश्चय करता है। अब एक वर्ग चाहता है की जॉन डो मर जाये और दूसरी तरफ मिशेल का हृदय परिवर्तन होता है और वो उसे मरने से रोकती है। अंत में जॉन विल्लोहबी, जॉन डो का चोला उतार कर, रात के अँधेरे में शहर छोड़ देता है।

इस कहानी में आपको NDTv, ABP, Aaj Tak, बरखा दत्त, रवीश कुमार, राजदीप सरदेसाई, राणा अयूब, येचुरी, राजा, केजरीवाल, सोनिया गांधी, रोहित वैमुला, कन्हैया सब के दर्शन हो जायेंगे।

वो फ़िल्म थी इसलिए मिशेल उसे जिन्दा रखती है लेकिन भारत की कहानी हकीकत है, यहां कोई किसी को नही बचाएगा।

जॉन डो बच गया लेकिन कन्हैया, रोहित वैमुला बनने से बचेगा इसमें शक है, क्योंकि उसकी पल पल होती मौत को टीवी पर कई रातों से देख रहा हूँ।